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Jul 13, 2026 janta24x7news

CM की कुर्सी से बगावत तक: जीतन राम मांझी, चंपाई सोरेन और चरणजीत सिंह चन्नी की सियासी कहानी, कैसे अपनी ही पार्टी के लिए बने चुनौती?

भारतीय राजनीति में कई बार परिस्थितियों ने नेताओं को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया, लेकिन बाद में वही नेता अपनी ही पार्टी के लिए चुनौती बन गए। बिहार के जीतन राम मांझी, झारखंड के चंपाई सोरेन और पंजाब के चरणजीत सिंह चन्नी की राजनीतिक यात्रा इसी बदलाव की मिसाल मानी जा रही है।

CM की कुर्सी से बगावत तक: जीतन राम मांझी, चंपाई सोरेन और चरणजीत सिंह चन्नी की सियासी कहानी, कैसे अपनी ही पार्टी के लिए बने चुनौती?

भारतीय राजनीति में कई ऐसे अवसर आए हैं जब राजनीतिक दलों ने परिस्थितियों और राजनीतिक समीकरणों के चलते किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाया। हालांकि समय बदलने के साथ यही फैसले उन दलों के लिए नई राजनीतिक चुनौती बन गए। बिहार, झारखंड और पंजाब की राजनीति में ऐसे तीन बड़े नाम सामने आते हैं—जीतन राम मांझी, चंपाई सोरेन और चरणजीत सिंह चन्नी।
इन तीनों नेताओं को अलग-अलग परिस्थितियों में मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन बाद में इनके रुख और राजनीतिक फैसलों ने अपनी-अपनी पार्टियों के सामने नई मुश्किलें खड़ी कर दीं। फिलहाल पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी के बयानों के बाद एक बार फिर इस तरह की राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा तेज हो गई है।
जीतन राम मांझी: मुख्यमंत्री से अलग पार्टी तक का सफर
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता दल (यू) के कमजोर प्रदर्शन के बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद पार्टी ने सामाजिक और राजनीतिक संतुलन साधने के लिए दलित नेता जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया।
करीब नौ महीने तक मुख्यमंत्री रहने के बाद जब नेतृत्व परिवर्तन हुआ और उन्हें पद छोड़ना पड़ा, तब उन्होंने खुलकर विरोध किया। बाद में उन्होंने जेडीयू से अलग होकर **हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM)** का गठन किया और अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई। इसके बाद बिहार की राजनीति में वे लगातार अलग भूमिका निभाते रहे।
चंपाई सोरेन: भरोसे के नेता से राजनीतिक विरोधी तक
झारखंड में वर्ष 2024 के दौरान कानूनी परिस्थितियों के कारण हेमंत सोरेन के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा ने चंपाई सोरेन को राज्य की कमान सौंपी थी।
बाद में हेमंत सोरेन की वापसी होने पर चंपाई सोरेन ने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। इसके कुछ समय बाद उन्होंने पार्टी नेतृत्व से असहमति जताई और झामुमो से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। इसके बाद वे लगातार राज्य सरकार और अपने पूर्व सहयोगियों पर राजनीतिक हमले करते रहे।
चरणजीत सिंह चन्नी: फिर से CM फेस बनने की मांग
पंजाब में वर्ष 2021 में कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन के बाद चरणजीत सिंह चन्नी को राज्य का पहला दलित मुख्यमंत्री बनाया गया था। उस समय पार्टी ने विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने के उद्देश्य से यह फैसला लिया था।
अब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच चन्नी फिर से मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर अपनी दावेदारी मजबूत करते दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि वे पार्टी नेतृत्व पर सीएम फेस घोषित किए जाने का दबाव बना रहे हैं। हालांकि कांग्रेस की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
चुनाव से पहले बढ़ सकती हैं राजनीतिक चुनौतियां
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी दौर में किसी भी दल के भीतर नेतृत्व को लेकर असहमति संगठन की रणनीति को प्रभावित कर सकती है। बिहार और झारखंड में ऐसे घटनाक्रम पहले देखने को मिल चुके हैं, जबकि पंजाब में भी नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा और अन्य दल अपने-अपने नेताओं के साथ राजनीतिक संतुलन कैसे बनाए रखते हैं। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले इन घटनाक्रमों का असर संबंधित राज्यों की राजनीति पर देखने को मिल सकता है।
Author - Janta24x7news
Credit - Janta24x7news

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