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Jun 17, 2026 Soummya

भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद विवादों में आई ‘डांसिंग गर्ल’, जानिए क्यों खास है 4500 साल पुरानी यह मूर्ति

सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध ‘डांसिंग गर्ल’ मूर्ति एक बार फिर चर्चा में है। भारत और पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक विरासत को लेकर चल रही बहस में इस ऐतिहासिक धरोहर का नाम सामने आया है।

भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद विवादों में आई ‘डांसिंग गर्ल’, जानिए क्यों खास है 4500 साल पुरानी यह मूर्ति
नई दिल्ली। सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध पुरातात्विक खोजों में शामिल ‘डांसिंग गर्ल’ मूर्ति एक बार फिर सुर्खियों में है। भारत और पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक धरोहरों को लेकर समय-समय पर उठने वाली बहस के बीच इस प्राचीन कांस्य प्रतिमा की चर्चा तेज हो गई है।

करीब 4500 वर्ष पुरानी मानी जाने वाली यह मूर्ति वर्ष 1926 में वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत स्थित मोहनजोदड़ो पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुई थी। सिंधु घाटी सभ्यता की यह खोज दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण प्राचीन कलाकृतियों में गिनी जाती है। मूर्ति में एक युवती को आत्मविश्वास भरे अंदाज में खड़े हुए दिखाया गया है, जिसके हाथों में कई चूड़ियां दिखाई देती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रतिमा प्राचीन भारत की धातु कला और शिल्प कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे कांस्य धातु से ‘लॉस्ट वैक्स कास्टिंग’ तकनीक के जरिए तैयार किया गया था, जो उस समय की उन्नत तकनीकी क्षमता को दर्शाती है।

भारत के विभाजन से पहले मिली कई ऐतिहासिक वस्तुओं के बंटवारे को लेकर दोनों देशों के बीच चर्चाएं होती रही हैं। ‘डांसिंग गर्ल’ भी उन धरोहरों में शामिल रही है जिनका नाम सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विवादों में समय-समय पर सामने आता रहा है। हालांकि वर्तमान में यह प्रतिमा भारत के संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है और इसे भारतीय उपमहाद्वीप की साझा सभ्यता की महत्वपूर्ण निशानी माना जाता है।

इतिहासकारों का मानना है कि सिंधु घाटी सभ्यता केवल किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे प्राचीन नगर आज भले ही अलग-अलग देशों की सीमाओं में हों, लेकिन उनका इतिहास पूरे क्षेत्र की सभ्यता और संस्कृति को जोड़ता है।

‘डांसिंग गर्ल’ की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह प्रतिमा विश्वभर में सिंधु घाटी सभ्यता की पहचान बन चुकी है। कला, इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्र में इसका विशेष महत्व माना जाता है। यही वजह है कि जब भी सांस्कृतिक धरोहरों और विरासत के संरक्षण की बात होती है, यह ऐतिहासिक मूर्ति चर्चा का केंद्र बन जाती है।
Author - Soummya
Credit - Culture Desk

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